पाम ऑयल की ‘बायो-डीजल’ नीति का सोयाबीन ऑयल पर असर

पाम तेल बनाने वाले प्रमुख देशों ने ‘बायो-डीजल’ बनाने की नई नीति लागू की है। इसकी वजह से दुनिया भर में खाने के लिए इस्तेमाल होने वाले पाम तेल की कमी हो गई है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में पाम तेल कम हुआ, तो भारत में इसकी जगह सोयाबीन तेल की मांग और खपत तेजी से बढ़ गई है।
इसका फायदा महाराष्ट्र के तेल उद्योग को मिल रहा है। यहाँ की तेल मिलों और पैकिंग यूनिट्स को सोयाबीन तेल के शुद्ध और ब्लेंडेड (मिश्रित) ऑर्डर बड़े पैमाने पर मिल रहे हैं, जिससे सोयाबीन क्रशिंग (बीजों से तेल निकालने का काम) का काम काफी बढ़ गया है।
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आपूर्ति का दबाव: पाम तेल उत्पादक देशों (विशेषकर दक्षिण-पूर्व एशिया) द्वारा अपनी घरेलू जैव-ईंधन जरूरतों (जैसे ‘B50’ मैंडेट) के लिए कच्चे पाम तेल का एक बड़ा हिस्सा आरक्षित करने से अंतरराष्ट्रीय निर्यात बाजार में पाम तेल की मात्रा कम हुई है। इसके परिणामस्वरूप, भारतीय बाजार सहित वैश्विक स्तर पर अन्य वनस्पति तेलों की मांग में वृद्धि हुई है।
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सोयाबीन तेल की ओर झुकाव: पाम तेल की बढ़ती कीमतों और सीमित उपलब्धता के कारण भारत जैसे आयात पर निर्भर देशों में उपभोक्ताओं और उद्योग जगत का झुकाव सोयाबीन तेल और सूरजमुखी तेल की ओर बढ़ा है।
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स्थानीय उद्योग को गति: भारत में बढ़ी हुई इस मांग का सीधा असर तेल प्रसंस्करण (Oil Processing) इकाइयों पर पड़ा है। महाराष्ट्र जैसे प्रमुख तेल उत्पादक राज्यों में सोयाबीन क्रशिंग और रिफाइनिंग इकाइयों की कार्यक्षमता में वृद्धि दर्ज की गई है। यहां की पैकिंग यूनिट्स को सोयाबीन तेल के शुद्ध और मिश्रित (Blended) रूपों के लिए बड़े ऑर्डर मिल रहे हैं, जिससे तेल मिलों में व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है।
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मूल्य स्थिरता और चुनौती: अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस प्रतिस्थापन (Substitution) प्रक्रिया के कारण अन्य तेलों की कीमतों पर भी दबाव बढ़ रहा है, जिसे संतुलित करने के लिए घरेलू स्तर पर तिलहन उत्पादन को बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
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